अवधू मेरा मन मतवारा
अवधू मेरा मन मतवारा ।
उनमनि चढा गगन रस पीवै, त्रिभुवन भया उजियारा ... अवधू
गुडकर ज्ञान ध्यान कर महुवा, भव भाठी करी भारा,
सुषमन नाडी सहज समानी, पीवै पीवनहारा ... अवधू
दोइ पुर जोरि चिनगारी भाठी, चुवा महारस भारी,
काम क्रोध दोई किया बनीता, छुटी गई संसारी ... अवधू
सुनि मंडल मैं मंदला बाजै, तहाँ मेरा मन नाचै,
गुरुप्रसादी अमृतफल पाया, सहज सुषमना काछै ... अवधू
पूरा मिला तबै सुख उपज्यो, तन की तपन बुझानी,
कहे कबीर भवबंधन छूटे, ज्योति ही ज्योति समानी ... अवधू
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
Share kre