संस्कृत का एक पुराना श्लोक है, जो कर्म को किस्मत से महत्तवपूर्ण बताता है-
उद्यमेन हि सिध्यंति कार्याणि न मनोरथै:।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा:॥
अर्थात - कोई भी काम कड़ी मेहनत से ही पूरा होता है सिर्फ सोचने भर से नहीं। कभी भी सोते हुए शेर के मुंह में हिरण खुद नहीं आ जाता।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
Share kre