साहब है रंगरेज, चुनरी मोरी रंग डारी
साहब है रंगरेज, चुनरी मोरी रंग डारी ।
स्याही रंग छुडायके रे, दियो मजीठा रंग,
धोये से छूटे नहीं रे, दिन दिन होत सु-रंग .. साहब.
भाव के कूंड नेह के जल में, प्रेम रंग देई बोर,
दुःख देह मैल लुटाय दे रे, खुब रंगी झकझोर ... साहब.
साहब ने चुनरी रंगी रे, प्रीतम चतुर सुजान,
सब कुछ उन पर वार दूँ रे, तन मन धन और प्रान ... साहब.
कहत कबीर रंगरेज पियारे, मुझ पर हुए दयाल,
शीतल चुनरी ओढिके रे, भई हौं मगन निहाल ... साहब.
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