बरसन लाग्यो रंग शबद चढ लाग्यो री
बरसन लाग्यो रंग शबद चढ लाग्यो री
जनम मरण की दुविधा भारी,
समरथ नाम भजन लत लागी
मेरे सतगुरु दीन्हीं सैन सत्य कर पा गयो री ... बरसन लाग्यो
चढी सूरज पश्चिम दरवाजा,
भ्रुकुटि महेल पुरुष एक राजा
अनहद की झंकार बजे वहां बाजा री ... बरसन लाग्यो
अपने पिया संग जाकर सोई,
संशय शोक रहा नहीं कोई,
कट गये करम कलेश, भरम भय भागा री ... बरसन लाग्यो रंग
शबद विहंगम चाल हमारी
कह कबीर सतगुरु दई तारी
रिमझिम रिमझिम होय ताल बस आई गयो री ... बरसन लाग्यो रंग.
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