रविवार, 8 अक्टूबर 2017

"शोक नही रहा अब हमे इश्क-ए-मोहबब्त का। वरना आज भी गाँव की गौरी पनघट पे और शहर की छोरी ट्यूशन पे हमाँरा इन्तजार करती ह "

"शोक नही रहा अब हमे इश्क-ए-मोहबब्त का। वरना आज भी गाँव की गौरी पनघट पे और शहर की छोरी ट्यूशन पे हमाँरा इन्तजार करती ह "

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