चलना है दूर मुसाफिर काहे सोवे रे
चलना है दूर मुसाफिर काहे सोवे रे
चेत अचेत नर सोच बाँवरे, बहुत नींद मत सोवे रे,
काम क्रोध मद लोभ में फँसकर, उमरीयाँ काहे खोवे रे ... चलना है
शिर पर माया मोह की गठरी, संग दूत तेरे होवे रे,
सो गठरी तेरी बिचमें छिन गई, मुढ पकडी कहाँ रोवे रे .. चलना है
रस्तो तो वो दूर कठिन है, चल बस अकेला होवे रे,
संग साथ तेरे कोई ना चलेगा, काके डगरिया जोवे रे .... चलना है
नदियाँ गहेरी नाव पुरानी, केहि बिधी पार तू होवे रे,
कहे कबीर सुनो भाई साधो, व्याज धोके मूल मत खोवे रे ....चलना है
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